अलीगढ : कप्तान के साये में भी असुरक्षित जनता; जीरो टॉलरेंस’ का जीरो निकला, SSP ऑफिस के बाहर मारपीट देखें विडियो......


जरा उस पीड़ित के नजरिए से सोचिए... जो थाने से ठोकर खाकर, उम्मीद की आखिरी डोर थामे कप्तान के दरवाजे पर पहुंचा हो , और अपनी ही आँखों के सामने उसी सुरक्षित घेरे में किसी और को 'पीड़ित' बनते देख ले। वह क्या सोचेगा? क्या उसे लगेगा कि यहाँ उसे न्याय मिलेगा? या उसे यह समझ आ जाएगा कि अगर कप्तान के साये में कोई सुरक्षित नहीं, तो इस पूरे जिले में कानून सिर्फ एक मजाक है।

सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे एक वीडियो में दावा किया जा रहा है कि SSP कार्यालय के बाहर कुछ महिलाओं ने दो पत्रकार/यूट्यूबर के साथ मारपीट कर दी। वीडियो में साफ दिख रहा है कि हंगामा हो रहा है, हाथापाई हो रही है, और पुलिस वहीं मौजूद है — लेकिन दखल देने की बजाय मूकदर्शक बनी नजर आ रही है।



इस पूरी घटना का सबसे 'शानदार' पहलू वह पुलिसकर्मी थे, जो पास ही खड़े होकर इस हिंसक ड्रामे का आनंद ले रहे थे। वायरल वीडियो को देखकर ऐसा लगता है मानो उन्हें सख्त हिदायत दी गई हो कि "जब तक मनोरंजन चरम पर न पहुँच जाए, बीच में दखल न दें।"

जब रक्षक ही 'मूकदर्शक' बन जाए, तो पीड़ित के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि—"अगर कप्तान की दहलीज पर मैं सुरक्षित नहीं हूँ, तो पूरे शहर में मेरी सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा?"

अगर कप्तान का घर सुरक्षित नहीं है, तो अलीगढ़ की गलियों में आम आदमी अपनी सुरक्षा की भीख किससे मांगे? यह घटना केवल मारपीट नहीं, बल्कि जिले की कानून-व्यवस्था का 'लाइव पोस्टमार्टम' है।

यह घटना सिर्फ दो गुटों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम की विफलता है जो अपने ही कार्यालय के बाहर अनुशासन कायम नहीं रख सका। एक तरफ प्रदेश में 'जीरो टॉलरेंस' और 'कानून के राज' की बातें होती हैं, वहीं दूसरी तरफ कप्तान के दफ्तर के बाहर की यह अराजकता उन दावों की हवा निकाल रही है।

यह भी सच है कि वायरल वीडियो पूरी कहानी नहीं बताते।

हो सकता है:

• विवाद अचानक बढ़ा हो

• पुलिस ने बाद में हस्तक्षेप किया हो

• या मामला आपसी भिड़ंत का हो

लेकिन … जनता वीडियो का पूरा बैकग्राउंड नहीं देखती, जो दिखता है वही सच मानती है।

और इस वीडियो में जो दिख रहा है, वो ये है कि: कानून के दरवाजे पर ही कानून बेबस नजर आया


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