परिवार के मुताबिक 4 मई को छात्रा स्कूल से लौट रही थी। आरोप है कि मोहल्ले के हिमांशु ने रास्ते में उसे पकड़ लिया और गलत हरकतें करने लगा। विरोध करने पर गालियां दीं और धमकी दी कि किसी को बताया तो बदनाम कर दूंगा और जान से मार दूंगा।
डरी-सहमी छात्रा जब घर पहुंची तो पिता शिकायत लेकर आरोपी के घर पहुंचे, लेकिन वहां इंसाफ नहीं, हाथापाई मिली। आरोप है कि आरोपी और उसके भाई ने पिता के साथ मारपीट कर दी।
परिवार का कहना है कि आरोपी पहले भी छात्रा पर फब्तियां कसता और परेशान करता रहा था। अब हाल ये है कि छात्रा ने स्कूल और ट्यूशन जाना तक छोड़ दिया।
5 मई को थाना हरदुआगंज में तहरीर दी गई। पुलिस ने रिसीविंग थमाई और फिर पूरा मामला शायद “धीमी आंच” पर रख दिया।
19 दिन तक थाना ऐसे शांत बैठा रहा जैसे नाबालिग से छेड़छाड़ नहीं, मोहल्ले में पतंग कटने का विवाद हुआ हो।
आखिरकार शुक्रवार रात दिल्ली से लौटे पिता ने सीधे एसएसपी से गुहार लगाई, तब जाकर पुलिस की नींद टूटी और मुकदमा दर्ज हुआ।
अब इलाके में लोग यही पूछ रहे हैं —
क्या थानों में नाबालिग बेटियों की सुनवाई के लिए भी “ऊपर से फोन” जरूरी हो गया है?
और अगर परिवार एसएसपी तक न पहुंचता, तो क्या यह तहरीर भी हमेशा की तरह फाइलों के अंधेरे में दबी रहती?
