नगर पंचायत जवां सिकंदरपुर का नज़ारा किसी कॉमेडी शो से कम नहीं। मां फूलवती देवी चेयरमैन हैं, लेकिन दफ्तर में कुर्सी पर बैठने का शौक बेटे पिंटू सूर्यवंशी को है। कर्मचारियों को हुक्म, अफसरों को धमकियां और दफ्तर में ठसक — यही उनकी रोज़ाना की आदत।
मामला तब गरमाया जब अधिशासी अधिकारी ने इनके ऑफिस आने पर रोक लगा दी। आदेश भी साफ लिखा गया कि चेयरमैन का बेटा कोई संवैधानिक पद नहीं है, इसलिए दफ्तर में घुसपैठ बंद करो। इसके बाद अचानक अफसर का ट्रांसफर हो गया।
अब गांव-गली में चर्चा चल निकली — “देखा, चेयरमैन के लड़के ने अफसर हटा दिया।”
लेकिन असलियत यह है कि किसी भी नगर पंचायत के चेयरमैन के बेटे-बेटियों के पास इतना हक़ होता ही नहीं। अफसर का तबादला केवल शासन और विभागीय प्रक्रिया से होता है। यानि अफसर का जाना पूरी तरह सिस्टम का नियम था, साहबज़ादे का “क्रेडिट कार्ड” नहीं।
फिर भी नेताजी अपनी जेब में हवा भरकर घूम रहे हैं मानो पूरा प्रशासन उन्हीं के इशारे पर नाचता हो। लोग तंज कस रहे हैं —
"सच तो ये है कि कुर्सी मां की है, और बेटा सिर्फ उसका साया खींच रहा है।"
नगर पंचायत के कर्मचारियों ने भी नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हम समझते हैं विभाग की फाइलें कहां से चलती हैं और अफसर कहां से हटते हैं। नेताजी बस अपनी अकड़ दिखाने के लिए नाम जोड़े घूमते हैं।"
दरअसल, लोकतंत्र में जनता का चुना प्रतिनिधि ही अधिकार रखता है। किसी चेयरमैन का बेटा चाहे कितना भी शोर मचाए, उसकी हैसियत दफ्तर में कुर्सी खिसकाने से ज़्यादा नहीं।