जूते को मुक्ति, मगर इंस्पेक्टर के अहंकार को नहीं
जूते को मुक्ति, मगर इंस्पेक्टर के अहंकार को नहीं करन चौधरी मैं एक जूता हूं... कोतवाल का जूता....बेशक में आम जूतों की तरह सड़कों की धूल, थाने की ड्यूटी में पैरों की रक्षा के लिए रगड़मपट्टी से गुजरता होऊ, मगर कोतवाल के पैरों में होने से मैं अपराधियों के साथ पीड़ितों में ठोकर मारने के काम में भी लिया गया हूं। मैं न्याय को अन्याय की ओर मोड़ने की जुगत में बहुत से चाटुकारों को चाटने के काम भी आया हूं इस बात का मुझे हमेशा गर्व गुमान रहा है। हालांकि खास आयोजनों पर मुझे आम जूतों की तरह बाहर उतारकर ही आदर की परंपरा निर्बहन की जाती है। साथ ही मंदिर अथवा किसी धार्मिक मंच पर तो दूर दरवाजे पर बाहर ही उतार दिया जाता है जहां में अक्सर लोगों के पैरों तले कुचला जाता हूं, पैरों के रौंदे जाने से मेरी चीख भले निकल जाए मगर मेरे लिए किसी के मन मे दया का भाव नहीं होता। किसी तीर्थ स्थल पर तो मेरी और बेकद्री होती है मुझे किसी जूता स्टैंड नामक जगह पर लावारिश की तरह छोड़ दिया जाता है वहां सैकड़ों पुराने बदबूदार जूते, चप्पलें, सैंडिल, मेरे ऊपर लदने से मेरा दम भले ही घुट जाए मगर मुझपर कोई रहम नहीं खाता.. इतना सहकर …